गुरुवार, 5 नवंबर 2009

क्योंकि मैं एक पवित्र..... बांके बिहारी लाल की जय

क्योंकि मै एक पवित्र नगरी मथुरा धाम से आया हूं। एक बार अपनी जिह्वा को पवित्र करके बोलिए बांके बिहारी लाल की जय। ये जयकारा था सारेगामापा लिटिल चैम्प हेमंत ब्रजवासी का। भइया हम और बाकी प्रतिभागी क्या किसी अपवित्र नगरी से हैं? हेमंत बबुआ क्या हमारे भारत के सारे राज्य और उनके सारे शहर अपवित्र हैं, केवल एक ही पवित्र नगरी बची है मथुरा। मथुरा को क्या वरदान मिला था कि कलियुग में एकमात्र नगरी मथुरा ही बचेगी जो पवित्र होगी। काशी वो नगरी है कहा जाता है जहां मात्र जन्म लेने पर सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। विश्वनाथबाबा के दशर्न से कठोर से कठोर पाप भी धुल जाते हैं। इंदौर वह नगरी है जिसके आस-पास महाकाल- ओंकारेश्वर जैसे पवित्र धाम हैं। कोलकाता, काली मां की पवित्र धरती । हमारे भारत में कौन सा ऐसा शहर है जहां किसी देवी-देवता का पवित्र धाम न हो, किसी भी धर्म का कोई न कोई धार्मिक स्थान जरूर होगा। ऐसे में किसी खास जगह का नाम लेना क्या क्षेत्रवाद को बढ़ावा देना नहीं है? क्या हेमंत बाबू और उनके पिताश्री हमें बताएंगे कि जिह्वा को पवित्र कैसे किया जाता है ताकि हम अपनी इस अपवित्र जिह्वा को पवित्र कर सकें. लगे हाथ पापों से मुक्ति का मार्ग भी बताएं। बहुत से पापियों करा उद्धार हो जाएगा। ऐसे देखा जाए तो अपनी तो कोई नगरी नहीं क्योंकि मेरा जन्म हाथरस में हुआ, मोदीनगर, मेरठ, अमरोहा, रामपुर, मुरादाबाद, लखनऊ, बाराबंकी, इलाहाबद में रही, पली-बढ़ी। शादी के बाद दिल्ली, जम्मू, भोपाल, पानीपत, इंदौर, रही। इंदौर वह नगरी है जहां भगवान गणेश की बहुत मान्यता है। वहां कोई भी कार्य बिना खजराना गणेश मंदिर जाए बिना शुरू नहीं होता। अब आप ही बताएं मैं किस नगरी की हूं ताकि आपकी जिह्वा को मैं भी पवित्र करवाकर बुलवाऊं शाह विलायत शाह की जय, शाहमीना शाह दरगाह की जय, देश को काका, निर्भय, वीरेंद्र तरुण, बोहरा जी जैसे ख्याति प्राप्त कवि देने वाली एक मात्र रस वाली नगरी हाथरस की जय, देवा शरीफ बाबा की जय, खजराना वाले गणपति की जय या गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम कराने वाली नगरी इलाहाबाद की जय। शायद मेरा ज्ञान कुछ कम है। बस एक ही बात महत्वपूर्ण है कि हम हिंदुस्तान में रहते हैं। कोना कोई भी हो, है तो हिंदुस्तान ही न?

मुझे याद है जब पापा का तबादला अमरोहा हुआ तो स्कूल भी बदला। नई क्लास में मेरा परिचय कराया गया। पीरियड खत्म होने के बाद एक लड़की मेरे पास आई और बोली हलो, प्लीज टू मीट यू, माई सेल्फ इज आलसो कायस्थ, चलो क्लास में एक से दो हुए। तुम श्रीवास्तव और मैं सक्सेना। मेरी समझ में नहीं आया कि हम दोनो कायस्थ लड़कियां मिलकर कौन-सा तीर मार लेंगी। मैने घर जाकर पापा को बताया तो मेरे पापा ने कहा कि कह दिया होता मैं तो हिंदुस्तानी हूं और यही पहचान है मेरी। शायद वही सीख है कि मैं कभी जाति-क्षेत्रवाद में नहीं पड़ी। मैं हिंदुस्तान में रहती हूं और हिंदुस्तानी हूं। इंसानियत मेरा धर्म है, दोस्ती और प्यार मेरा ईमान।

आज तक हम क्यों क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद, धर्मवाद, ऊंच-नीच इन सब विचारों से उबर नहीं पाए हैं? इन शब्दों पर क्यों हम अटक जाते हैं? क्यों हम आपस में बैर पाले हैं? क्यों अपने इर्द-गिर्द नफरतों का जाल बुनकर बैठे हैं? आपस के बैर में ईश्वर, खुदा, रब, गाड, अल्लाह, को अलग करके देखते हैं, उसकी सीख, प्यार, उसकी बनाई दुनिया को भूल गए। हमारे लिए हमारे खुद के बनाए नियम एहमियत रखने लगे, उस परमपिता परमेश्वर का अस्तित्व कुछ नहीं। प्यार करने के तरीके क्या अलग होते हैं? क्या हिंदुओं में अलग तरह से प्यार होता है और सिख, ईसाई, मुसलमानों में अलग तरह से, जैसे प्यार-प्यार होता है वैसे ही इबादत-इबादत होती है और प्यार तो खुद एक पूजा है। इंसानियत तो सबसे बड़ा धर्म है। हमारे रास्ते अलग हो सकते हैं लेकिन मंजिल तो एक है। फिर किसलिए किसी खास शहर, धर्म, भाषा का प्रचार? इसलिए मेरी गुजारिश है कि आने वाले कार्यक्रमों में क्षेत्रवाद को बढ़ावा न दिया जाए। हमने हिंदुस्तान में जन्म लिया है, हमें गर्व से कहना चाहिए कि हम हिंदुस्तानी हैं।

1 टिप्पणी:

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