सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

`सच का सामना' या व्यक्ति को नग्न करने खेल

मैं अपने नए ब्लाग शिकंजी के साथ अपने ब्लाग मित्रों के बीच हूं । इसमें आपको कुछ मीठी-कुछ खट्टी टिप्पणियों के साथ समाज की वास्तविकता भी देखने को मिलेगी। हौसलाफजाही के रूप में आप की राय व टिप्पणियां भी मिलती रहीं तो मनोबल तो बढ़ेगा साथ ही मैं और भी बेहतर कर सकूंगी।

`सच का सामना', आपने ठीक समझा यह उसी कार्यक्रम के बारे में है जो स्टार प्लस पर प्रसारित हुआ था। उसकी आखिरी कड़ी के दो-तीन दिन बाद आपकी अदालत में रजत शर्मा ने सच का सामना के प्रस्तुतकर्ता राजीव खंडेलवाल, प्रश्न तैयार करने वाले सिद्धार्थ बसु और कुछ प्रतिभागियों को बुलाया था। उसके बाद मैने यह लेख लिखा था और 29 सितम्बर को दिल्ली के एक प्रतिष्ठित हिंदी अखबार को ई.मेल द्वारा भेजा था, 24 अक्टूबर को जब मैने उनसे फोन पर बात की तो उनका जवाब था कि मेरे पास रोज इतने लेख आते हैं सबको देखना बहुत मुश्किल है। इसके लिए तो एक आदमी रखना पड़ेगा।

अखबार से पाठक नहीं होते बल्कि पाठकों से अखबार होता है। ना तो मै अखबार का नाम लेना चाहती नहीं व्यक्ति विशेष का। मैं हिंदी अखबारों में चल रही अव्यवस्था के खिलाफ बताना चाह रही हूं। मैंने भी 11-12 साल अखबार में काम किया है। तब शायद इतनी खराब व्यवस्था नहीं थी, पाठकों से इस तरह बात नहीं की जाती थी। आज क्या वजह है जो पाठकों से इस तरह से बात की जाती है कि इसके लिए हमें एक आदमी रखना पड़ेगा। यह समस्या पाठकों की नहीं है अखबार की है, वो कितने व्यक्ति रखे। लेखों की भी श्रेणी होती है जिनमें कुछ सम-सामयिक होते हैं और कुछ समय बाद उनकी उपयोगिता ही खत्म हो जाती है। ऐसे लेखों को पहले छापना होता है या उपयोगी न होने पर वापस कर दिया जाता है। अब तो ई.मेल का युग है कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। लिखने वाले हजारों होते हैं अखबार को अनेक लेख मिलते हैं लेकिन लिखने वाले के लिए उसका अपना ही लेख होता है जिसमें उसकी भावनाएं होती हैं जो वह बांटना चाहता है। उम्मूद है अखबार में काम करने वाले पत्रकार भाई पाठकों की भावनाओं का ध्यान रखेंगे। वह लेख ब्लाग के पाठकों के लिए प्रस्तुत है।

सच का सामना

जिंदगी जीने का सबका अपना अंदाज होता है। अंदाज के साथ उसका अधिकार भी है ऐसे में किसी के भी अधिकार या अंदाज पर दखल देना कहां तक उचित है या उचित है भी या नहीं। जहां तक मैं समझती हूं और शायद ठीक ही समझती हूं किसी भी व्यक्ति के पास अपने जीवन के अलावा कुछ भी निजी नहीं है। उस पर भी मीडिया सेंध मार चुका है। बची-खुची कसर हम लोग आपस में ही टांग खीचकर पूरी कर लेते हैं। मुद्दे पैदा करना और उलटी दिशा में चलना हमारी फितरत बन चुकी है। किसी का सही या गलत होना या हमारी सोच में सही-गलत का फैसला दोनों बातें अलग हैं। गलत को तो गलत ठहराया ही जाना चाहिए लेकिन दुख वहां होता है जहां केवल अड़ंगे लगाने के लिए,टांग खीचने के लिए सही को भी गलत ठहराया जाता है। अभी टी.वी.के स्टार प्लस चैनल पर एक कार्यक्रम प्रसारित हुआ `सच का सामना। इसके साथ ही शुरू हुई मुद्दों की श्रंखला। पहला मुद्दा सामाजिक मान्यता बना। हम किन सामाजिक मान्यताओं की बात करते हैं जो हमने अपनी सोच और फायदे के अनुसार निर्धारित की है। इधर आने वाले सभी सीरियलों में किन सामाजिक मान्यताओं का ध्यान रखा जाता है। विवाह पूर्व व विवाह के बाद संबंधों को दिखाना आम बात है। शादी के कुछ वर्षों कहीं से एक लड़का या लड़की का आना और घर की शालीन व प्रिय बहू का बेटा या बेटी होने का दावा करना, जो बाद में सही निकलता है। शादी के बाद प्रेम संबंधों का होना कुछ नया नहीं। रजत शर्मा ने भी सच का सामना को लेकर`आपकी अदालत में यही मुद्दे बार-बार उठाए। बच्चा गिराना, गर्भवती होना जैसे शब्दों को और उनके बारे में आज छोटे-छोटे बच्चे भी जानते हैं। छठी-सातवीं में पढ़ने वाले बच्चे सेक्स करते हैं। टीवी पर दिखाई एक रिपोर्ट में जब लड़कों से पूछा गया कि आप लोग सैक्स करतें हैं तो उनका जवाब था`हां, जब ये पूछा गया कि क्या लड़कियों के साथ आप जबरदस्ती करते हैं या बहलाते-फुसलाते हैं। तो उन्होने कहा वो अपनी मर्जी से करती हैं हम जबरदस्ती नहीं करते और लड़कियों से पूछने पर उन्होंने धड़ल्ले से कहा जब लड़के कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं, गोया ये कोई प्रतियोगिता है या कंधे से कंधा मिलाकर चलने की प्रतिबद्धता। ये हैं हमारे आज के समाज के बच्चे। कहां गईं सामाजिक मान्यताएं। जब टी.वी. चैनल पर दिल्ली के ही कुछ स्कूलों के बारे में ये रिपोर्ट दिखाई गई तब रजत शर्मा ने उन स्कूलों के प्रधानाचार्य या प्रबंधन को आपकी अदालत में क्यों नहीं घसीटा ? जिन स्कूलों में शिक्षक छात्र-छात्राओं का यौन शोषण करते हैं उन स्कूलों के प्रबंधन को क्यों कटघरे में खड़ा नहीं किया जाता। जहां तक `सवाल सच का सामना का है उसका समय भी रात दस बजे का था जब बच्चों के सोने का समय होता है उस दौरान स्क्रीन पर लगातार चलता है कि अविभावकों की निगरानी आवश्यक है और यदि बच्चे कहना नहीं मानते तो आप उन्हें क्या सीख देंगे और बाद में उसका समय 11 बजे कर दिया गया।

अब जरा उस कार्यक्रम पर भी चर्चा करें। उस कार्यक्रम में हमें क्या परोसा जा रहा था। सच का सामना करने वाले हर व्यक्ति से शारीरिक संबंधों के बारे में जरूर पूछा गया। महिला से उसके पति के सामने पूछा गया कि कहीं और शादी होती तो आप ज्यादा खुश होतीं? क्या तलाक हो चुका है? ये कैसा जीवन है जहां शादी के डेढ़ साल बाद गुपचुप ढंग से तलाक ले लिया जाता है और घर वालों को पता भी नहीं चलता। इसके बावजूद साथ रहें और गर्ल फ्रैंड छूटने का इंतजार रहे। जहां हुसैन साहब जैसे कलाकार अपनी बेटी से छोटी उम्र की लड़की से शारीरिक संबंधों को स्वीकार करें। जहां व्यक्ति विशेष ये बताए कि जरूरत के लिए उसने समलैंगिक संबंध बनाए, पैसों के लिए शादीशुदा महिलाओं से संबंध बनाए। योगा सिखाने के बहाने उसने अपने क्लाइंट्स को सेक्स वर्कर् उपलब्ध करवाए और ये सब अपने माता-पिता, भाई की मौजूदगी में स्वीकार करे। क्या यही सामाजिक मान्यता है, लिहाज है। इतना सब जानने के बाद माता-पिता कैसे गले से लगा सकते हैं और वो कैसे उनकी नजरों का सामना कर सकता है। क्या यही शिक्षा हमें दी जाती है कि एक दिन इस तरह हम घरवालों का नाम रोशन करें, सबके सामने शर्मसार करें? बाबी डार्लिंग ये खुलासा करे कि उसके पुरुष मित्रों ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने चाहे। जहां धड़ल्ले से स्वीकार किया जाए कि शादी के बाद उनके शारीरिक संबंध कहीं और हैं। इस कार्यक्रम के जरिए लोगों को क्या संदेश दिया गया कि समाज में सैक्स ही सबकुछ है। किसी भी स्तिथि में, किसी भी उम्र में, इस भूख की न कोई सीमा है न अंत, न रिश्ते हैं न शर्म। ये आम चलन है आप भी सारी सामाजिक मान्यताओं को ताख पर रखकर बिंदास होकर सैक्स करिए और फिर रुपयों की खातिर रिश्तों को तार-तार करिए। उस मंच पर ऐसे प्रत्येक व्यक्ति का स्वागत हुआ जो किसी न किसी रूप से अनेक के साथ शारीरिक संबंधों से जुड़ा रहा। ये तो खुला आमंत्रण है जिसने जितने ज्यादा पाप किए हों (क्योंकि ये पुण्य तो हो नहीं सकता, हां, करने वालों की नजर में सही जरूर है क्योंकि ये उनका नजरिया है) आफिस में घपले किए हों, नकली व घटिया सामान सप्लाई किया हो और जो बेशर्मी से रुपयों के लिए सबके सामने स्वीकार कर सकता हो हां, मैने सारे गलत काम किए हैं और ये कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि ये सारे काम भी रुपयों के लिए ही किए गए। यानि जीवन का एकमात्र उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण रुपया कमाना है। ये तो गलत काम को पुरुस्कृत करना जैसा हुआ। हो सकता है सीजन टू में वो महिलाएं आएं जो देह व्यापार करती हों और जिनको लोग पहचानते हैं उन्हें सबके सामने आकर स्वीकार करने से क्या गुरेज होगी?

आज से बीस साल पहले मैं एक ऐसी लड़की को जानती थी जिन्होने कई बार अपने शरीर का सौदा किया था। मैने उन्हें हमेशा दीदी कहा। आज भी मैं उनकी इज्जत करती हूं। हम लोग उस समय लखनऊ शिफ्ट हुए थे। मुझे मना किया गया था कि उनसे दूर रहूं। हालांकि मेरी मां भी उन्हें दोषी नहीं मानती थीं लेकिन बदनामी की हवा से सभी दूर रहना चाहते हैं। मैं छोटी जरूर थी मगर इतनी भी नहीं कि चीजें नहीं समझती थी। अगर मेरे जाने के बाद ये घटता तो मैं जरूर उनका साथ देती। उन्होने जो किया रुपए कमाने के लिए नहीं बल्कि अपनी बहन की जान बचाने के लिए। पहली बार वो पचास रुपए के लिए बिकी थीं, वो भी अपने चचेरे चाचा के हाथ। पिता ने लाखों की जायदाद बर्बाद कर दी थी। उनकी दो छोटी बहनें और एक पागल भाई था। बड़ी मुश्किल से वो इंटर कर पाई थीं। घर चलाने के लिए दीदी मोहल्ले के छोटे से स्कूल में पढ़ाती थीं। एक बार उनकी सबसे छोटी बहन को बुखार चढ़ा। वो बुखार से तप रही थी दवा के लिए रुपए नहीं थे। वो स्कूल के प्रिंसिपल के पास रुपए मांगने गई तो उन्होंने उनसे कीमत मांगी और दीदी खरी-खोटी सुनाकर वापस आ गईं लेकिन रात में उसकी तबियत बिगड़ गई और वो मदद मांगने अपने चचेरे चाचा के पास गईं और वहां उनके जीवन की पहली रात घटी जिसने फिर ऐसी कई रातें दीं। जिस लड़के को चाहती थीं उसने सब जानते हुए अपनाना चाहा लेकिन होने वाली सास के कारण उन्होने शादी नहीं की। फिर जब उन्हें पता चला कि उसी चाचा की गंदी नजरें उनकी छोटी बहन पर पड़ रही हैं तो अपनी बहन को बचाने के लिए लड़का ढूंढा और कम उम्र में ही उन्होने उसकी शादी कर दी ताकि उसकी इज्जत बच सके। लड़के का एक पैर जरूर खराब था लेकिन परिवार बहुत सम्पन्न था उन्होने अपनी बहन को इज्जत के साथ विदा किया। उनके बेशर्म पिता उनकी कमाई खाते रहे। पागलपन में भाई की मृत्यु हो गई। बीमारी में सबसे छोटी बहन चल बसी। उसके बाद पता चला कि उस लड़के ने उनसे शादी कर ली और उसके बाद उस मोहल्ले में कभी नहीं आई। अब पता नहीं वो किस गुमनामी के अंधेरे में गुम हो गई। खुद मजबूरी को भोगा मगर बहन को बचाया, जब दोनो भाई-बहन की मृत्यु हो गई तो खुद फाके किए मगर फिर बिकी नहीं। आज वो हैं भी या नहीं। मैं नहीं जानती मगर मैं उनको सलाम करती हूं। उन्होने हार नहीं मानी थी। उस प्रिंसिपल के आगे वो झुकी नहीं लेकिन तबियत बिगड़ने पर वो अपने चाचा के पास ही गईं थी और लूटने वाला अपना ही निकला। फिर भी उन्होने अपनी बहन पर आंच नहीं आने दी। छोटे भाई-बहन की मृत्यु के बाद उन्होने वह जगह ही छोड़ दी। वो कोई अकेली ऐसी लड़की नहीं हैं, बहुत होंगी जिन्होने अपने परिवार के लिए अपनी इज्जत का सौदा किया होगा क्योंकि बच्चे पैदा करने के बाद गरीबी के कारण माता-पिता पढ़ा नहीं पाते और हमारा तथाकथित समाज इन्हीं बातों का फायदा उठाकर लड़कियों को शिकार बनाता है। शायद भगवान ने बड़ी बहन को ये जज्बा देकर भेजा है कि छोटे भाई-बहनों के लिए वो कुरबान हो जाएं। लेकिन इसके बाद वो परिवार को शर्मसार नहीं करतीं लेकिन सेक्स वर्कर उपलब्ध कराना तो दलालों का काम है, धंधा है उनका। इसमें झूठ-सच क्या। क्योंकि वो दस लाख-पच्चीस लाख जीत रहे हैं तो माता-पिता दलाली जैसे गुनाह माफ कर रहे हैं। अगर वाकई में शर्मिंदगी है तो पहले अपने माता-पिता के सामने सच क्यों नहीं कुबूल किया। क्यों अब तक छुपाए रखा। ये भी सच है कि किसी को जबरदस्ती नहीं बुलाया गया था लेकिन ये कौन सा जौहर दिखाने का मंच था जहां पर उसके साहस या गुणों को परखा जा रहा था। जहां तक सामाजिक मान्यताओं और संस्कृति की बात है तो हमें रिश्तों का और महिलाओं का सम्मान करना सिखाया जाता है। मंजिल पाने के लिए गलत रास्ता नहीं चुनने की सलाह दी जाती लेकिन शो का उद्देश्य क्या था कि जो जितने ज्यादा कपड़े उतारेगा, उतने ज्यादा रुपए ले जाएगा। जो नंगा हो जाएगा उसे एक करोड़ मिलेगा। ये तो कपड़े उतारने-उतरवाने का शो था। इससे ज्यादा कुछ नहीं।

इसे आप वीणा के सुर पर भी देख सकते हैं

3 टिप्‍पणियां:

  1. आप बिलकुल ठीक कह रही हैं, चाहें अखबारों की बात हो या सीरियल की।

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  2. beena ji
    bahut sateek likha hai aapne. sach ke naam par jhoot aur pariwarik ke naam par sab kuch aisa jo kabhi kisi pariwar me hota nahi..pesh karna budhhubaxe ki aadat me shamil hai.

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  3. वीणा जी , आपके इस लेख में सामाजिक मान्यताओं के संदर्भ में जो अंतर्द्वन्द्व सामने आ रहे हैं.. इन अंतर द्वंद्वो का सामना आप अकेली नहीं कर रहीं हैं .. सारा समाज इन्हीं अंतर्द्वंद्वों की चपेट मैं है और मजे की बात यह है इस लेख में जो तर्क और युक्तियाँ तथाकथित समाजिक मान्यताओं (विवाह-सम्बन्ध और यौन-शुचता आदि) के पक्ष में प्रस्तुत की गई हैं वे उन्हीं मान्यताओं के विरोध में जा रही हैं..दो निष्कर्ष मेर इस प्रकार हैं
    १.सेक्स और हिंसा कोई ऐसी चीज़ें नहीं हैं जिनकी सामाजिक स्तर पर उपेक्षा की जाये और बच्चों को इनकी गहरी समझ से वंचित रखा जाये और इन्हें व्यर्थ की वर्जनाओं के घेरे में रखा जाये..
    २. वर्तमान पारिवारिक ढांचा हर प्रकार के सामाजिक उपद्रव असंतोष और विघटन का सीधे सीधे जिम्मेदार है ..इसे टूटना होगा और इससे पहले की यह ध्वस्त हो इसका विकल्प भी तलाशना होगा .. मुझे तो कृष्ण के समय की नन्द-गोप की कम्यून व्यवस्था सबसे बेहतर हल के रूप में नजर आती है ..

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